बिहीबार, १४ मंसिर, २०८०

अब बदलिने मन छैन

सिताराम घिमिरे, शनिबार, २० आश्विन, २०८०

अब बदलिने मन छैन

म यति टुटेको रैछु कि अब जुट्ने मन छैन

सबै यति झुटा रैछन् सत्य बोल्ने मन छैन।

रंग उत्रिसक्यो आफ्ना मुश्किलको वर्षाले

सबैजसो उस्तै लाग्छन् कसैलाई सोध्ने मन छैन।

कर्तव्य निभाएँ तैपनि आँखामा बिझाएँ सबको

अरु के सोंच्छन् थाहा छैन मेरो सोंच्ने मन छैन।

कसैले के छ भनि सोधे आँसु लुकाएर लुकेन

यति धेरै रोएँ कि म अब खुशी हुने मन छैन।

खोजी थियो रोजी रोटीको पुरा हुन नसक्दा

टाढा यति आएँ अब फर्कन पटक्कै मन छैन।

समयको साथ साथ वाध्यताले बदलिएँ म पनि

यसरी बदलिएँ कि अब फेरी बदलिने मन छैन।

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प्रतिक्रिया
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